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Wednesday, 7 October 2026

3618 Nature changes its colours (English poetry)

 


Clouds come gathering, then sunshine shines bright,

Nature changes its colours, a beautiful sight.

When we stay in the sun, we sweat all day,

And evening brings cold when the sun fades away.

So many colours this earth lets us see,

Each one leaves a sweet feeling within you and me.

When we too are a part of nature’s great show,

Why should our story be different, tell me so?

5.05pm 7 Oct 2026

Tuesday, 6 October 2026

3617 बद्रीधाम

 बेर के पेड़ों से घिरा वन क्षेत्र,

निकाल अलकनंदा से, आदि शंकराचार्य ने,

स्थापित की शालिग्राम की मूर्ति 

फिर कहलाया बद्रीधाम।


सत्युग में कहते भगवान विष्णु ने,

बद्रीनाथ क्षेत्र में कठोर तपस्या की।

भारी बर्फबारी और मौसम के कष्टों से बचाने

माता लक्ष्मी ने बद्री का पेड़ बन रक्षा की।

माता लक्ष्मी की तपस्या देख भगवान विष्णु ने,

इस स्थान का नाम रखा बद्रीधाम।


नर नारायण ने,

शिव पार्वती ने,

शंकराचार्य ने,

की अराधना इस स्थान पर।

अहिल्याबाई होलकर ने छत्र चढ़ाया।

लुप्त हुए इस स्थान को फिर इक बार लोगों तक पहुंचाया।

 6.24pm 6 Oct 2026

Monday, 5 October 2026

3616 मौसम दिखाए रंग



क्या कहूँ कैसे कहूँ, मौसम दिखाए रंग।

पहाड़ तो चलें ही चलें,बादल भी चलते संग।

धूप निकल आती फिर कुछ दूरी पर ऐसे।

कर देती उड़ते बादलों को भंग।

है न कुछ अजीब ही प्रकृति देखो।

कुछ समझ में नहीं आते इसके ढंग।

आओ लें जीवन का मज़ा।

हो‌लें इसके ही अंग संग।

3.42pm.5 Oct 2026

Sunday, 4 October 2026

3615 केदारनाथ

 वाह रे बाबा केदारनाथ

 तूने कर दिया बहुत कमाल

 पल में थी धूप निकली 

पर में हो गई बरसात।

5.05pm 4 oct 2026

Saturday, 3 October 2026

3614 ऊँचे पहाड़

 


पहाड़ ऊँचे इतने कि छू रहै आसमान।

सड़कों का घुमाव धनुष के‌ जैसा।

उस पे चीड़ के पेड़ जैसे चढ़ी हो कमान।


कभी चढ़ते चढ़ाई, कभी नीचे आ जाते।

आते जाते वाहन मुश्किल से निकल पाते।

पर करता नहीं कोई किसी को परेशान।


रंग बिरंगे फूल खिले हैं कहीं।

हज़ारों पराजातियाँ वृक्षों की कहीं।

देखकर प्रकृति को हूँ मैं हैरान।

2.08pm 3 Oct 2026

Friday, 2 October 2026

3613 झरने बहते झर झर

 


झरने झर झर बहते जाएं।

चाहे कितना शोर मचाएं।

फिर भी कितने मन को बाएं।


पहाड़ो से ये निकलें कल कल।

शोर मचाए ज़ोर से हर पल।

गीला करे धरती को जल।


चाहे पाएं आंँखें अजब सकून।

फिर भी रहता मन में जुनून।

दिल ये कहे बस यहीं रुकूं।

5.11pm 2 Oct 2026

Thursday, 1 October 2026

3612 अपनों के लिए जीना नहीं आता



 होते हैं कुछ लोग दूसरों के लिए जीने वाले।

अपनों के लिए जीना उन्हें नहीं आता।

कैसे बताऊँ शरीर से ही नहीं मन से भी सेवा होती।

लोग देखते हैं तुम्हें शरीर की सेवा करते माना।

अपने तोतो भावों के ही भूखे होते हैं।

उसपे कभी तुमने ध्यान न डाला।

जी लेना कभी अपनों के लिए भी।

क्योंकि अपने तो अपने होते हैं।

3.56pm 1 Oct 2026