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Tuesday, 6 October 2026

3317 बद्रीधाम

 बेर के पेड़ों से घिरा वन क्षेत्र,

निकाल अलकनंदा से, आदि शंकराचार्य ने,

स्थापित की शालिग्राम की मूर्ति 

फिर कहलाया बद्रीधाम।


सत्युग में कहते भगवान विष्णु ने,

बद्रीनाथ क्षेत्र में कठोर तपस्या की।

भारी बर्फबारी और मौसम के कष्टों से बचाने

माता लक्ष्मी ने बद्री का पेड़ बन रक्षा की।

माता लक्ष्मी की तपस्या देख भगवान विष्णु ने,

इस स्थान का नाम रखा बद्रीधाम।


नर नारायण ने,

शिव पार्वती ने,

शंकराचार्य ने,

की अराधना इस स्थान पर।

अहिल्याबाई होलकर ने छत्र चढ़ाया।

लुप्त हुए इस स्थान को फिर इक बार लोगों तक पहुंचाया।

 6.24pm 6 Oct 2026

Monday, 5 October 2026

3316 मौसम दिखाए रंग



क्या कहूँ कैसे कहूँ, मौसम दिखाए रंग।

पहाड़ तो चलें ही चलें,बादल भी चलते संग।

धूप निकल आती फिर कुछ दूरी पर ऐसे।

कर देती उड़ते बादलों को भंग।

है न कुछ अजीब ही प्रकृति देखो।

कुछ समझ में नहीं आते इसके ढंग।

आओ लें जीवन का मज़ा।

हो‌लें इसके ही अंग संग।

3.42pm.5 Oct 2026

Sunday, 4 October 2026

3615 केदारनाथ

 वाह रे बाबा केदारनाथ

 तूने कर दिया बहुत कमाल

 पल में थी धूप निकली 

पर में हो गई बरसात।

5.05pm 4 oct 2026

Saturday, 3 October 2026

3614 ऊँचे पहाड़

 


पहाड़ ऊँचे इतने कि छू रहै आसमान।

सड़कों का घुमाव धनुष के‌ जैसा।

उस पे चीड़ के पेड़ जैसे चढ़ी हो कमान।


कभी चढ़ते चढ़ाई, कभी नीचे आ जाते।

आते जाते वाहन मुश्किल से निकल पाते।

पर करता नहीं कोई किसी को परेशान।


रंग बिरंगे फूल खिले हैं कहीं।

हज़ारों पराजातियाँ वृक्षों की कहीं।

देखकर प्रकृति को हूँ मैं हैरान।

2.08pm 3 Oct 2026

Friday, 2 October 2026

3613 झरने बहते झर झर

 


झरने झर झर बहते जाएं।

चाहे कितना शोर मचाएं।

फिर भी कितने मन को बाएं।


पहाड़ो से ये निकलें कल कल।

शोर मचाए ज़ोर से हर पल।

गीला करे धरती को जल।


चाहे पाएं आंँखें अजब सकून।

फिर भी रहता मन में जुनून।

दिल ये कहे बस यहीं रुकूं।

5.11pm 2 Oct 2026

Thursday, 1 October 2026

3312 अपनों के लिए जीना नहीं आता



 होते हैं कुछ लोग दूसरों के लिए जीने वाले।

अपनों के लिए जीना उन्हें नहीं आता।

कैसे बताऊँ शरीर से ही नहीं मन से भी सेवा होती।

लोग देखते हैं तुम्हें शरीर की सेवा करते माना।

अपने तोतो भावों के ही भूखे होते हैं।

उसपे कभी तुमने ध्यान न डाला।

जी लेना कभी अपनों के लिए भी।

क्योंकि अपने तो अपने होते हैं।

3.56pm 1 Oct 2026

Wednesday, 30 September 2026

3311 यमुना की लहरें



 यमुना की लहरें मचाती शोर।

आसमान पर छा जाते बादल घनघोर।

मन खिल उठता देख नैसर्गिक सुंदरता।

ऐसी प्राकृती नज़र आती चहुँ ओर।


छँटते बादल तो होता उजियारा।

मन खिल उठता देख सुंदर नज़ारा।

तारे टिमटिमाते, चाँद चाँदनी बिखेरता।

देखते-देखते हो जाती सुंदर भोर।


रंग भरता कितने सुंदर जीवन की पतंग में।

उड़ाता मनमर्जी से किसी भी दिशा में।

चाहे उड़ाए ऊंँचा, चाहे काटे डोर।

हाथ में उसके सबकी डोर।

6.37pm 30 Sept 2026