तुझे माँ लिख रहा हूँ एक चिट्ठी।
देश के लिए मिट्टी हो जाऊँ,
केसरिया बाना पहन के जाऊँ।
कहता हूँ भर मुट्ठी मैं मिट्टी।
धधकता है ये सीना जैसे हो भट्ठी।
तुझे माँ लिख रहा हूँ एक चिट्ठी।
दुश्मन सरहद पर गए हैं आ,
हमने भी डेरे लिए हैं सजा।
अब तो चला खुद होने मिट्टी।
धधकता है ये सीना जैसे हो भट्ठी।
तुझे माँ लिख रहा हूँ एक चिट्ठी।
तिरंगा सीमा पर मैं लहराऊँगा,
या फिर उसमें लिपट के आऊँगा।
माँ, बात तुझसे कहता नहीं झूठी।
धधकता है ये सीना जैसे हो भट्ठी।
तुझे माँ लिख रहा हूँ एक चिट्ठी।
तुझे भी माँ मुझपे फिर फख़्र होगा ,
बापू का सीना भी फूल उठेगा।
ज़िंदा रहा तो आऊँगा छुट्टी।
धधकता है ये सीना जैसे हो भट्ठी।
तुझे माँ लिख रहा हूँ एक चिट्ठी।
8.01pm 28 Dec 2025


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