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माँ-बेटी आपस में बातें कर लेती हैं।
दुख-सुख मिलकर सांझा कर लेती हैं।
चाहे कोई कितना भी नीचा दिखाए,
हर बात को कलेजे में सह लेती हैं।
लोग कहते हैं बेटे चाहिए, बेटियाँ नहीं,
पर बेटियों से ही घर में रौनक आती है।
जब विदा होकर ससुराल जाती हैं,
फिर लौटकर वे वापस नहीं आती हैं।
सिर्फ बेटों से ही जीवन का सुख नहीं,
बेटियों बिना बेटे भी मिलते नहीं।
जहाँ बेटियाँ न हों घर-आँगन में,
वहाँ खुशी भी नहीं आती है।
सब कहते हैं माँ ठंडी छाँव होती है।
फिर उन पेड़ों को क्यों काटते जाते हो।
अगर छाँव इतनी प्यारी है तुम्हें,
तो उन वृक्षों को क्यों नहीं बचाते हो।
सब कहते हैं, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।
इन नारों से क्या सच में होगा काम।
मैं कहती हूँ, बेटा पढ़ाओ, संस्कार सिखाओ,
तभी बदलेगा समाज, तभी बदलेगा इंसान।
आओ बेटियों पर हम प्यार लुटाएँ,
देश को आगे, और आगे बढ़ाएँ।
छोड़ें बेटी-बेटे का सारा भेद।
इसी में है सच्चा उजला भविष्य-संदेश।
7.44pm 28 Jan 2026

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