Presenting my Second Ghazal Sangreh to President of Chandigarh Sahitya Academy
Punjabi version 2263
English version 3379
उड़ती जाती है, झुकती नहीं।
क्योंकि मैं कवि हूँ।
शब्दों को अपने हीरे-मोती मानता हूँ।
कलम से गूंथ कविता का हार बुनता हूँ।
क्योंकि मैं भी कवि हूँ।
अनंत गहराई में खुद को ले जाता हूँ।
इतना खो जाता हूँ कि अपना आप भूल जाता हूँ।
क्योंकि मैं कवि हूँ।
पता नहीं कहाँ-कहाँ तक पहुँच हैं मेरे ख़यालों की।
ज़रूरत नहीं मुझे सोचने की, किसी सवालों की।
क्योंकि मैं कवि हूँ।
मेरी अपनी ही दुनिया है ख़्वाबों की।
ख़्यालों में ही जी लेता हूँ ज़िंदगी नवाबों की।
क्योंकि मैं कवि हूँ।
मुझे नहीं चाह ऊँचे तख़्त-मीनारों की।
खुला आसमान भाता है, नहीं ज़रूरत दीवारों की।
क्योंकि मैं कवि हूँ।
8.11pm 29 Jan 2026

No comments:
Post a Comment